केरलम : उपराष्ट्रपति ने माता अमृतानंदमयी मठ की नेपाल राहत और मानवीय पहलों की शुरुआत की

कोल्लम, 27 सितंबर (वार्ता) उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने रविवार को यहां अमृतापुरी में आयोजित समारोह में माता अमृतानंदमयी मठ की कई मानवीय पहलों की शुरुआत की, जिनमें नेपाल में बाढ़ राहत के लिए दो करोड़ रुपये की सहायता, जरूरतमंद मरीजों के लिए मुफ्त सर्जरी सहायता और मछुआरों के परिवारों को वित्तीय मदद शामिल है।
श्री राधाकृष्णन ने माता अमृतानंदमयी देवी के 73वें जन्मदिवस के अवसर पर आयोजित विश्व सेवा दिनम समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया को तकनीकी प्रगति के साथ-साथ 'संवेदनशील प्रगति' की भी जरूरत है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विकसित भारत की यात्रा में यह सुनिश्चित होना चाहिए कि कोई भी पीछे न छूटे। उन्होंने कहा कि सेवा का वास्तविक मापदंड केवल सेवा पाने वाले लोगों की संख्या या मानवीय कार्यक्रमों के पैमाने में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में आये बदलाव में निहित है। उपराष्ट्रपति ने बताया कि मठ ने 1998 से अब तक 890 करोड़ रुपये से अधिक की धर्मार्थ चिकित्सा सेवा प्रदान की है, जिससे मुफ्त इलाज और शल्य क्रियाओं से 64 लाख से अधिक लोग लाभान्वित हुए हैं। उन्होंने मठ की अन्य प्रमुख पहलों का भी जिक्र किया, जिनमें बेघर लोगों के लिए 50,000 से अधिक मकानों का निर्माण, दुनिया भर में 55,000 से अधिक छात्रवृत्तियां, एक लाख से अधिक जरूरतमंद लोगों के लिए पेंशन और वंचित समुदायों के लिए आजीविका कार्यक्रम शामिल हैं। श्री राधाकृष्णन ने समारोह के दौरान नेपाल में बाढ़ राहत के लिए दो करोड़ रुपये की सहायता राशि भारत में नेपाल के राजदूत सुरेंद्र थापा को सौंपी। उन्होंने कोच्चि और फरीदाबाद स्थित अमृता अस्पतालों में जरूरतमंद लाभार्थियों को मुफ्त शल्य चिकित्साओं के प्रमाण पत्र और मछुआरों के परिवारों को वित्तीय सहायता भी वितरित की। उन्होंने भारत-श्रीलंका में 50,000 मकानों के निर्माण के पूरा होने के उपलक्ष्य में 'अमृताकुटीरम 30वीं वर्षगांठ स्मारिका' के साथ-साथ आश्रम के तीन प्रकाशनों 'द हनुमान चालीसा', 'द ओशन ऑफ ग्रेस' और 'सत्यम शिवम सुंदरम' का विमोचन किया। माता अमृतानंदमयी देवी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उपराष्ट्रपति ने उनके जीवन को प्रेम, करुणा और निस्वार्थ सेवा का संदेश बताया तथा कहा कि सेवा की भावना भारत की सभ्यतागत संस्कृति में गहराई से समायी हुई है।उन्होंने याद किया कि बचपन से ही अम्मा ने भोजन, कपड़े, स्नेह और करुणा प्रदान कर अपने आसपास के लोगों के दुखों को दूर किया। श्री राधाकृष्णन ने कहा कि मठ का मानवीय कार्य एक गांव की छोटी लड़की की करुणा से शुरू होकर आज भारत और दुनिया भर में लाखों लोगों के जीवन को छूने वाले आंदोलन में बदल गया है।उन्होंने विशेष रूप से अमृताश्री का उल्लेख किया, जिसके तहत गरीब और संवेदनशील समुदायों की लगभग 2.5 लाख महिलाओं को शुरुआती पूंजी, व्यावसायिक प्रशिक्षण और माइक्रोफाइनेंस के माध्यम से सहायता प्रदान की गयी है। उन्होंने बताया कि इस पहल के तहत 15,000 से अधिक स्वयं सहायता समूह काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा, "जब एक महिला आर्थिक रूप से सशक्त होती है, तो उसका प्रभाव किसी एक व्यक्ति तक सीमित न रहकर पूरे समाज पर पड़ता है।" उन्होंने कहा कि नारी शक्ति का अर्थ सशक्तीकरण, गरिमा, अवसर और नेतृत्व है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि मठ की सेवा का विस्तार छात्रवृत्तियों, टैबलेट आधारित शिक्षा, ट्यूशन, प्रौढ़ साक्षरता और व्यावसायिक प्रशिक्षण के माध्यम से शिक्षा के क्षेत्र में भी हुआ है, जिससे वंचित समुदायों के लिए नये अवसर पैदा हो रहे हैं। श्री राधाकृष्णन ने कहा कि सेवा की असली परीक्षा अक्सर संकट के समय होती है। उन्होंने हिंद महासागर में आयी सुनामी, गुजरात भूकंप, उत्तराखंड बाढ़, केरलम बाढ़, कोविड-19 महामारी और वायनाड भूस्खलन के बाद मठ के चलाये गये राहत और पुनर्वास कार्यों को याद किया। उन्होंने भारत सरकार के नमामि गंगे कार्यक्रम में मठ के 100 करोड़ रुपये के योगदान और स्वच्छता अभियानों, टिकाऊ ग्रामीण जीवन कार्यक्रमों तथा वृक्षारोपण सहित इसकी पर्यावरणीय पहलों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 'अमला भारतम' पहल के तहत देशभर में कई स्वच्छता अभियान चलाये गये हैं, जबकि संयुक्त राष्ट्र के 'बिलियन ट्री कैंपेन' के हिस्से के रूप में दुनिया भर में 10 लाख से अधिक पेड़ लगाये गये हैं। श्री राधाकृष्णन ने कहा कि सेवा जाति, पंथ, भाषा, क्षेत्र और राष्ट्रीयता से परे है तथा केवल एक ही पहचान - मानवता को मानती है। उन्होंने इसे विश्व सेवा दिनम का मूल दर्शन बताया। दुनिया के सामने मौजूद संघर्षों, मानवीय संकटों, प्राकृतिक आपदाओं, विस्थापन, गरीबी, अकेलेपन और पर्यावरणीय चुनौतियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि केवल तकनीकी प्रगति ही मानवता की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकती। उन्होंने कहा, "मानवता को संवेदनशील प्रगति की आवश्यकता है।" उपराष्ट्रपति ने कहा कि विकसित भारत की ओर भारत की प्रगति के लिए बुनियादी ढांचे, प्रौद्योगिकी, निवेश, नवाचार और आर्थिक विकास की आवश्यकता है, लेकिन विकास का एक मानवीय चेहरा भी होना चाहिए। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया कि आधुनिकता और भारत के सभ्यतागत मूल्य एक साथ आगे बढ़ें। उन्होंने कहा कि 'विकास भी, विरासत भी' का सिद्धांत विकसित भारत की ओर देश की यात्रा का मार्गदर्शन करे। श्री राधाकृष्णन ने अपने संबोधन में माता अमृतानंदमयी देवी को 'चमत्कार' बताते हुए उन्हें प्रणाम किया और आशा व्यक्त की कि उनका सेवा-उन्मुख आंदोलन लाखों लोगों तक पहुंचता रहेगा और एक अधिक शांतिपूर्ण, टिकाऊ और करुणामय दुनिया के निर्माण में योगदान देगा। कार्यक्रम में केरलम और तमिलनाडु के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर, राज्य के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन, केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री किंजरापु राममोहन नायडू, केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी, केरलम विधानसभा अध्यक्ष तिरुवंचूर राधाकृष्णन, राज्य के मंत्री, केरलम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति गोपीनाथ, सांसद एनके प्रेमचंद्रन और शशि थरूर, नेपाल के राजदूत सुरेंद्र थापा, विधायक, स्वामीजी, श्रद्धालु और स्वयंसेवक शामिल हुए। आलम जितेन्द्र वार्ता

