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खंडेलवाल ने निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों की मनमानी को लेकर नड्डा को लिखा पत्र

नयी दिल्ली 07 मई (वार्ता) राष्ट्रीय राजधानी में चांदनी चौक लोकसभा क्षेत्र के सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्र स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जेपी नड्डा से निजी अस्पतालों से डिस्चार्ज के समय टीपीए (थर्ड पार्टी एडमिनिस्ट्रेटर), बीमा कंपनियों तथा अस्पतालों के बीच होने वाली अनावश्यक देरी को समाप्त करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।
श्री खंडेवाल ने इस संबंध में श्री नड्डा को पत्र लिखा है। उन्होंने श्री नड्डा को लिखे पत्र में कहा है कि दिल्ली सहित देशभर में लाखों लोगों ने खुद की और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए स्वास्थ्य बीमा लिया हुआ है, लेकिन कुव्यवस्था के कारण ये लोग मानसिक, शारीरिक और आर्थिक पीड़ा झेलने को मजबूर हैं।
उन्होंने कहा है कि आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं, महंगे बीमा प्रीमियम और कैशलेस इलाज की व्यवस्था के बावजूद यदि मरीज को अस्पताल से छुट्टी पाने के लिए घंटों या पूरा दिन प्रतीक्षा करनी पड़े, तो यह पूरी व्यवस्था की संवेदनहीनता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि इलाज पूरा होने और डॉक्टर द्वारा फिट घोषित किए जाने के बाद भी मरीजों को केवल फाइलों, ई-मेल, दस्तावेजों और औपचारिक अनुमोदनों के नाम पर अस्पतालों में रोके रखना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
श्री खंडेलवाल ने भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के अध्यक्ष अजय सेठ को भी अलग से पत्र भेजकर बीमा कंपनियों और टीपीए के लिए सख्त तथा समयबद्ध दिशा-निर्देश जारी करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि लोग स्वास्थ्य बीमा इसलिए लेते हैं ताकि बीमारी के समय उन्हें आर्थिक सुरक्षा और मानसिक राहत मिल सके, लेकिन आज स्थिति इसके ठीक विपरीत हो गई है। बीमा सुविधा अब राहत का माध्यम बनने के बजाय अनेक मामलों में "प्रशासनिक प्रताड़ना" का कारण बनती जा रही है।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सांसद ने कहा है कि स्वास्थ्य बीमा और कैशलेस इलाज की व्यवस्था का मूल उद्देश्य मरीज को राहत और सुरक्षा देना था, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में मरीज अस्पताल, बीमा कंपनी और टीपीए के "कुचक्र" में फंस जाता है। उपचार के बाद भी मरीज और उसका परिवार प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बंधक बनकर रह जाते हैं। यह स्थिति स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में लोगों के विश्वास को कमजोर करती है और बीमा क्षेत्र की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।
उन्होंने कहा कि अस्पताल डिस्चार्ज प्रक्रिया समय रहते शुरू नहीं करते, टीपीए बार-बार नए दस्तावेज मांगते हैं और बीमा कंपनियां स्पष्ट जवाबदेही से बचती हैं। छुट्टियों, रविवार और देर रात के समय स्थिति और भी गंभीर हो जाती है क्योंकि संबंधित अधिकारी उपलब्ध नहीं होते। कई अस्पतालों में मरीजों को यह कहकर रोका जाता है कि "फाइनल अप्रूवल" नहीं आया है, जबकि इलाज की मंजूरी पहले ही मिल चुकी होती है। यह पूरी व्यवस्था मरीज-केंद्रित होने के बजाय प्रक्रिया-केंद्रित बन चुकी है, जो मानवीय संवेदनाओं के विरुद्ध है।
श्री खंडेलवाल ने कहा कि यदि डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान और अन्य वित्तीय सेवाएं कुछ मिनटों में संभव हैं, तो अस्पताल डिस्चार्ज जैसी संवेदनशील प्रक्रिया घंटों तक लंबित रहना पूरी तरह अनुचित है। तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस युग में मरीजों को फाइलों और औपचारिकताओं के नाम पर परेशान करना किसी भी आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
उन्होंने आग्रह किया है कि केंद्र सरकार तत्काल एक सख्त और समयबद्ध नीति लागू करे, जिसके तहत डिस्चार्ज दस्तावेज जमा होने के बाद एक से दो घंटे के भीतर अंतिम टीपीए स्वीकृति अनिवार्य हो, तय समय में जवाब न मिलने पर "डीम्ड अप्रूवल" माना जाए और मरीज को तत्काल जाने दिया जाए, अनावश्यक देरी पर अस्पताल, टीपीए और बीमा कंपनियों की स्पष्ट जवाबदेही तय हो,पूरी प्रक्रिया के लिए एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया जाए, 24×7 क्लेम क्लियरेंस सुविधा उपलब्ध हो तथा मरीजों के लिए प्रभावी और त्वरित शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए।
उन्होंने कहा, "जो मरीज चिकित्सकीय रूप से स्वस्थ होकर घर जाने के लिए तैयार है, उसे प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण अस्पताल में रोके रखना अमानवीय है। स्वास्थ्य व्यवस्था का उद्देश्य मरीज को राहत देना होना चाहिए, न कि उसे कागजी औपचारिकताओं और संस्थागत उदासीनता के जाल में फंसाना। दुर्भाग्य से वर्तमान व्यवस्था में ठीक ऐसा ही हो रहा है।"
संतोष, मधुकांत
वार्ता
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