ऑपरेशन सिंदूर के बाद तीनों सेनाओं के बीच तालमेल और ड्रोन-विरोधी क्षमता बढ़ाने और हथियारों की खरीद में तेजी पर जोर

नयी दिल्ली, 15 सितम्बर (वार्ता) सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के बाद सैन्य क्षमताओं की व्यापक समीक्षा और आकलन के आधार पर पुनर्गठन, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल, मानवरहित प्रणालियों, ड्रोन-विरोधी क्षमताओं, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और हथियारों की तेजी से खरीद पर अधिक ध्यान दिया है।
रक्षा मंत्रालय की हाल ही में जारी वार्षिक रिपोर्ट 2025-26 में कहा गया है कि इस अभियान के बाद यह माना गया कि सेना की महत्वपूर्ण क्षमताओं में कमियों को तेजी से दूर किया जाए और उसे तकनीक-प्रधान तथा कई क्षेत्रों में एक साथ लड़े जाने वाले युद्ध के लिए तैयार किया जाए। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑपरेशन के बाद भारत ने अपनी सैन्य क्षमताओं में मौजूद कमियों की व्यापक समीक्षा की है, जिसमें सेना के पुनर्गठन, तीनों सेनाओं के बीच बेहतर तालमेल और उभरती तकनीकों को शामिल करने पर स्पष्ट ध्यान दिया गया है। रिपोर्ट ने ऑपरेशन सिंदूर को आतंकवाद के खिलाफ भारत के संकल्प का एक मजबूत प्रमाण बताया और कहा कि सेना ने पाकिस्तान के आतंकवादी ढांचे के भीतर काफी गहराई तक एक संतुलित और निर्णायक हमला किया। रिपोर्ट में कहा गया कि ऑपरेशन सिंदूर केवल सैन्य सफलता नहीं था, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी था।
इस अभियान में सेना की कई क्षेत्रों में एक साथ कार्रवाई करने की क्षमता, रणनीतिक दूरदर्शिता और संयम दिखाई दिया। इसने खुफिया जानकारी में बढ़त, अत्याधुनिक तकनीक और संयुक्त सैन्य कार्रवाई की तैयारी के महत्व को भी सामने रखा। पहलगाम हमले के तुरंत बाद सेना ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं और उपकरणों की कमियों तथा उन्हें दूर करने के उपायों की पहचान करने के लिए विचार-विमर्श किया गया। इसमें देश और विदेश, दोनों जगहों से उपकरण हासिल करने के विकल्पों पर विचार किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि ऑपरेशन सिंदूर के पहले चरण से मिली सीख के आधार पर विशेष उपकरणों को शामिल करके भारतीय सेना की क्षमता बढ़ाने के लिए व्यावहारिक तरीका अपनाया जा रहा है। ऑपरेशन सिंदूर से मिली एक महत्वपूर्ण सीख नई तकनीकों में स्वदेशी क्षमताओं को तेजी से विकसित करने की जरूरत थी। रिपोर्ट में माना गया कि ड्रोन और मंडराकर हमला करने वाले हथियारों के क्षेत्रों में स्वदेशी उद्योग विशेष उत्पाद उपलब्ध कराने में सक्षम नहीं है। इस कमी को दूर करने के लिए सेना ने एडीआईटीआई और डीआईएससी के तहत नौ फास्ट ट्रैक डेवलपमेंट प्रोजेक्ट शुरू करने का प्रस्ताव दिया। रक्षा सचिव ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और रक्षा उत्पादन विभाग को इन्हें आईडेक्स परियोजनाओं के रूप में आगे बढ़ाने का निर्देश दिया।
मानव रहित विमान प्रणाली और इनके खतरों से निपटने के लिए एक मुख्य समिति भी बनाई गई है, जिसे इन प्रणालियों को शामिल करने, बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने और उनकी क्षमता बढ़ाने से जुड़े फैसले लेने का अधिकार दिया गया है। इसके अलावा, सेना ने इसके लिए एक अलग विशेष उद्देश्य वाली संस्था बनाने का प्रस्ताव तैयार किया है। इसे विशेष वित्तीय अधिकार देने की योजना है, ताकि अनुसंधान, विकास और खरीद का काम तेजी से किया जा सके। सेना ने इसके साथ-साथ पुनर्गठन और नई सैन्य इकाइयों के गठन का काम भी आगे बढ़ाया है। रिपोर्ट में कहा गया कि नई पीढ़ी के उपकरणों और सेना की क्षमता बढ़ाने वाली नई इकाइयों, जिनमें रुद्र ब्रिगेड, शक्तिबाण रेजिमेंट, दिव्यास्त्र बैटरी और भैरव बटालियन शामिल हैं, को शामिल किया गया है।
विशेष रूप से हाइब्रिड युद्ध और तेज गति वाले अभियानों में काम करने के लिए 15 भैरव बटालियन बनाने के आदेश दिए गए हैं। सेना ने चरणबद्ध तरीके से हर इन्फैंट्री बटालियन में एक अश्नी ड्रोन प्लाटून स्थापित करने का भी फैसला किया है। इसके लिए मौजूदा टोही और निगरानी संसाधनों को पुनर्गठित करके विशेष ड्रोन तकनीक को शामिल किया जाएगा। रिपोर्ट में कहा गया कि ऑपरेशन सिंदूर के अनुभव ने आधुनिक उपकरणों को प्रशिक्षित सैनिकों के साथ जोड़ने के महत्व को और मजबूत किया है। इसमें कहा गया कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद यह सामने आया है कि अत्याधुनिक उपकरणों को तेजी से उपलब्ध कराने की क्षमता के साथ उनका इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना सशस्त्र सेनाओं को मजबूत करने की प्राथमिक जरूरत बनी हुई है। इस अभियान ने देश में ही रक्षा तकनीक और उपकरण विकसित करने वाली अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं को भी बढ़ावा दिया है।
इनमें रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियां, निजी उद्योग और स्टार्ट-अप मिलकर काम कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, गोला-बारूद के 175 प्रकारों में से 159 प्रकार, यानी लगभग 91 प्रतिशत, अब देश में ही बनाए जा रहे हैं। आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटों से निपटने और पर्याप्त भंडार सुनिश्चित करने के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने की 10 साल की चरणबद्ध योजना तैयार की गई है। सेना ने छोटे और मध्यम उद्योगों के साथ मिलकर देश में ड्रोन बनाने की क्षमता भी विकसित की है। अब तक 819 ड्रोन बनाए जा चुके हैं, जिनमें निगरानी ड्रोन, कामिकाजे/सशस्त्र ड्रोन और एफपीवी ड्रोन शामिल हैं।
संजीव, मधुकांत वार्ता

