बिरला ने राज्य विधानमंडलों के लिए डिजिटल ऑडिट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने का किया आह्वान

तिरुवनंतपुरम, 04 नवंबर (वार्ता) लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद की तर्ज पर देश के सभी राज्य विधानमंडलों के लिए डिजिटल ऑडिट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म विकसित करने का आह्वान करते हुए कहा कि इससे लेखा परीक्षा संबंधी टिप्पणियों की व्यवस्थित निगरानी, उन पर की गयी कार्रवाई की समीक्षा और लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों का समयबद्ध निस्तारण सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
श्री बिरला ने केंद्र और राज्यों की लोक लेखा समितियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर लेखापरीक्षा एवं मूल्यांकन की एक व्यापक व्यवस्था विकसित करने पर भी जोर दिया। लोकसभा अध्यक्ष ने तिरुवनंतपुरम में संसद तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के विधानमंडलों की लोक लेखा समितियों के सभापतियों के दो दिवसीय सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि विधायी निगरानी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल जरूरी है।
उन्होंने हालांंकि आगाह किया कि तकनीकी प्रगति मानवीय विवेक, मूल्यों और संवेदनशीलता का विकल्प नहीं बन सकती। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्राप्त आंकड़ों की सटीकता, प्रामाणिकता और निष्पक्षता बनाये रखना भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी का उद्देश्य संस्थागत जवाबदेही मजबूत करना और निर्णय लेने की गुणवत्ता बेहतर बनाना होना चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि सार्वजनिक धन के उपयोग में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लोक लेखा समितियों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) जहां स्वतंत्र और निष्पक्ष लेखापरीक्षा करते हैं, वहीं लोक लेखा समितियां इन निष्कर्षों की विस्तृत जांच कर सिफारिशें देती हैं और उन पर कार्रवाई सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाती हैं। लेखापरीक्षा की टिप्पणियां केवल रिपोर्टों और सरकारी अभिलेखों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उनके आधार पर प्रशासनिक व्यवस्था में ठोस सुधार भी दिखायी देना चाहिए। कार्यपालिका को समितियों की सिफारिशों का समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, सामाजिक कल्याण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में सार्वजनिक धन के प्रत्येक रुपये का उचित हिसाब रखा जाना चाहिए और उसका इस्तेमाल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए, जिसके लिए उसे आवंटित किया गया है। विधायी निगरानी का दायरा केवल सरकारी खर्च की जांच तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि योजनाओं से अपेक्षित लाभ मिल रहे हैं या नहीं और नागरिकों के जीवन में वास्तविक सुधार हो रहा है या नहीं।
श्री बिरला ने सम्मेलन में अंगीकृत 'केरलम संकल्प' को लोक लेखा समितियों को सशक्त बनाने और विधायी निगरानी की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शक बताया। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में हुए विचार-विमर्श और सामने आयी सिफारिशों को ठोस संस्थागत कार्रवाई में बदलना होगा। इसका उद्देश्य वित्तीय अनुशासन मजबूत करना, संस्थागत क्षमताओं का विकास करना और केंद्र तथा राज्यों में शासन को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और परिणामोन्मुखी बनाना होना चाहिए।
उन्होंने लोक लेखा समितियों के सदस्यों, कैग अधिकारियों और विधायी कर्मचारियों के नियमित प्रशिक्षण तथा क्षमता निर्माण पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, तेजी से बदलती तकनीक के दौर में सदस्यों और अधिकारियों को नई तकनीकों और डिजिटल उपकरणों की जानकारी होना आवश्यक है, ताकि वे अपनी निगरानी संबंधी जिम्मेदारियों को अधिक प्रभावी ढंग से निभा सकें।
उन्होंने संसद और राज्य विधानमंडलों की समितियों के बीच नियमित बैठकें आयोजित करने तथा विभिन्न राज्यों की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों और तकनीकी नवाचारों को साझा करने का भी सुझाव दिया। संसद की लोक लेखा समिति के सभापति के. सी. वेणुगोपाल ने कहा कि सार्वजनिक धन के उपयोग की प्रक्रिया लगातार जटिल होती जा रही है। ऐसे में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए लोक लेखा समितियों को बदलते समय के अनुरूप स्वयं को विकसित करना होगा। उन्होंने कहा कि विधायिकाओं के समक्ष प्रस्तुत लेखापरीक्षा निष्कर्षों को सार्थक जवाबदेही में परिवर्तित करने का महत्वपूर्ण कार्य लोक लेखा समितियां करती हैं।
उन्होंने सरकारी योजनाओं की समयबद्ध लेखापरीक्षा और लेखापरीक्षा प्रतिवेदनों को सदनों के पटल पर शीघ्र रखे जाने की आवश्यकता पर बल दिया। मंत्रालयों और विभागों की ओर से उत्तर देने में देरी, अधूरे उत्तर अथवा उत्तर नहीं दिए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कार्यपालिका से समय पर पूर्ण उत्तर उपलब्ध कराने का आह्वान किया।
आजाद अशोक वार्ता

