भारत के विकास में गति, स्वस्थ प्रकृति दोनों है : मोदी
नयी दिल्ली, 19 सितंबर (वार्ता) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को कहा कि भारत ने अपने आर्थिक विकास को गति देने के साथ-साथ प्रकृति के स्वास्थ्य का भी पूरा ध्यान रखा है।
भारत पेरिस जलवायु सम्मेलन में घोषित अपने लक्ष्यों को समय से पहले पूरा करने वाला देश है। श्री मोदी राजधानी में राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) द्वारा आयोजित दो दिन के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे। पर्यावरण एवं जलवायु की गति के भविष्य पर आयोजित इस सम्मेलन में 17 देश के न्यायाधीश, न्यायिक अधिकारी, अधिवक्ता, पर्यावरणविद् और विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।
उद्घाटन सत्र में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, पर्यावरण एवं वन मंत्री भूपेंद्र यादव और एनजीटी के अध्यक्ष प्रकाश श्रीवास्तव की उपस्थिति में प्रधानमंत्री ने एनजीटी ऐप का बटन दबाकर उद्घाटन किया जिसमें उपयोगकर्ता एनजीटी के सभी मामलों की स्थिति और प्रगति आदि की जानकारी अपने मोबाइल पर प्राप्त कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा, "हमारा विकास तेज गति वाला है और स्वस्थ भी है।" उन्होंने कहा कि पिछले 12 साल में उनकी सरकार ने सौर ऊर्जा और हरित ऊर्जा के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किए हैं, जलमार्गों और रेल मार्गों के विकास और विद्युतीकरण, मेट्रो रेलवे नेटवर्क के विस्तार तथा इलेक्ट्रिक वाहनों के तेज चलन से कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है। घने वन क्षेत्रों में वृद्धि हुई है।
उन्होंने अथर्ववेद के मंत्र "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की संस्कृति में धरती को मां के रूप में देखा गया है। उन्होंने कहा, "भारत, जी-20 में इकलौता ऐसा देश है जिसने पेरिस जलवायु सम्मेलन ( काप-21 में किए सभी वादों (राष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं) को समय से पहले पूरा करके दिखाया है।" उन्होंने कहा, "बीते 12 वर्षों में पर्यावरण से जुड़े हर क्षेत्र में... भारत ने असाधारण प्रगति की है। भारत यह दिखा रहा है कि विकास और पर्यावरण की स्थिरता साथ-साथ कैसे चल सकते हैं।"
उन्होंने कहा कि भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के स्रोतों के विकास पर बड़ा ध्यान दिया है और इस दिशा में उठाए गए कदमों ने पर्यावरण सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाई है। श्री मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने यह भी कहा, "अक्सर कार्बन उत्सर्जन की ज़िम्मेदारी गलत तरीके से विकासशील देशों पर डाली जाती रही है। जबकि ऐतिहासिक सच्चाई ये है... आज भी प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में भारत का योगदान वैश्विक औसत के आधे से भी कम है!"
अधिकारियों का कहना है कि यह सम्मेलन न्यायिक दृष्टिकोण, वैज्ञानिक ज्ञान, पर्यावरण शासन प्रणालियों और सभी न्यायालयों में संस्थागत अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए एक मंच प्रदान करेगा। यह नीति निर्माण, कार्यान्वयन और प्रवर्तन में अंतराल सहित महत्वपूर्ण पर्यावरणीय और जलवायु चुनौतियों पर बातचीत की सुविधा प्रदान करेगा और पर्यावरण शासन तथा संस्थागत सहयोग को मजबूत करने के तरीकों का पता लगाएगा।
मनोहर उप्रेती वार्ता

