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बिहार झिझिया सांस्कृतिक स्मृति दो मोतिहारी

झिझिया की आत्मा उसके गीतों में बसती है। लोकभाषा में रचे गए इन गीतों में देवी की वंदना, परिवार की कुशलता और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा की कामना एक साथ सुनाई देती है। "तोहरे भरोसे बरहम बाबा, झिझिया बनवलिन हो" और "डाकिनी के नजरिया ना लागे, साकिनी के बाण ना लागे" जैसे पारंपरिक गीत लोकसमाज की आस्थाओं और सांस्कृतिक अनुभवों को स्वर देते हैं।इन गीतों की विशेषता उनकी सहजता है। इनमें शास्त्रीय भाषा का आडंबर नहीं, बल्कि गांव की बोली, घरेलू जीवन की चिंता और सामूहिक प्रार्थना का अपनापन है। गीतों को गाते हुए महिलाएं केवल देवी से रक्षा की…

समाचार विवरण:

कुल शब्द:
100
टाइप:
टेक्स्ट
यूआरएल स्लग:
बिहार झिझिया सांस्कृतिक स्मृति दो मोतिहारी
स्रोत:
UNI Varta
कैटेगरी
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प्रकाशित तिथि
15/10/26 13:23
पिछला अपडेट
15/10/26 13:23
स्थान
India