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टसर हस्तशिल्प की लुप्त होती आभा का करुण विलाप : परम्परा के जर्जर होते धागे

नयी दिल्ली, 13 मार्च (वार्ता) टसर रेशम की वह अलौकिक बुनावट, जिसमें कारीगरों की उंगलियाँ सौंदर्य का संगीत बुनती थीं, आज विस्मृति के अंधियारे गर्भ में विलीन हो रही है। वह बेजोड़ बारीकी और वह अद्वितीय कौशल, जो कभी भारत की पहचान था, अब केवल इतिहास की धूल भरी परतों में ही शेष रह गया है। वे शिल्पी, जिन्होंने अपने खून पसीने से टसर के एक-एक सूत में प्राण फूंके थे, वे थक चुके हैं। उनकी अनमोल कृतियों की केवल सुगंधित स्मृतियाँ ही अवशेष के रूप में भावी पीढ़ियों के मानस पटल पर अंकित हैं। काल के निष्ठुर प्रवाह में…

समाचार विवरण:

कुल शब्द:
100
टाइप:
टेक्स्ट
यूआरएल स्लग:
टसर हस्तशिल्प कारीगर परेशानी
स्रोत:
UNI Varta
कैटेगरी
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प्रकाशित तिथि
13/03/26 00:00
पिछला अपडेट
13/03/26 00:00
स्थान
India