देशों में अराजकता पैदा कर ' पिट्ठुओं' को स्थापित करने वाली 'आसुरी' ताकतों से देशवासी रहे सावधान :संघ प्रमुख

नागपुर , 20 अक्टूबर (वार्ता) राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने देशवासियों को ऐसी शक्तियों के प्रति सावधान किया है जो दुनिया में जगह-जगह समाज में टकराव और अराजकता पैदा कर अपने पिट्ठुओं को स्थापित करने के प्रयास में लगी हैं।
श्री भागवत ने मंगलवार को कहा कि ये शक्तियां भारत , हिंदू समाज और संघ को तोड़ने की योजना में लगी रहती हैं और उन्हें कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं का साथ मिल जाता है। ऐसी ताकतें एक मजबूत भारत को सबसे बड़ी चुनौती मानती हैं और देश को उनकी चालों के प्रति सावधानी रहना होगा । श्री भागवत ने नागपुर में संघ के विजयदशमी उत्सव-2026 को संबोधित करते हुए कहा कि समाज में समस्याएं हैं, व्यवस्था में कमी भी हो सकती है और उसके खिलाफ आंदोलन भी हो सकते हैं, पर आंदोलन विद्वेष पैदा करने के लिए नहीं बल्कि कानून की मर्यादाओं में तथा समस्याओं के समाधान के लिए होने चाहिए।
संघ प्रमुख ने कहा, ' भारत सहित सारे विश्व में जो भी भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक और मानवीय संस्कार है, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट, उद्ध्वस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है। विश्व भर के तथाकथित विकसित देश भी उस से त्रस्त, असहाय है ।" वे भारत को प्रगति करते नहीं देखना चाहती क्योंकि इसे वे अपने लक्ष्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं।
उन्होंने कहा कि पिछले दशकों में भारत ने अपनी शक्ति तथा सुनीति के कारण विश्व में धीरे धीरे अपना स्थान बनाया है और भारत को अपने समाज के पुरुषार्थ, मजबूत नीतियों, नेतृत्व, देशाभिमान तथा विश्व के प्रति अपने दायित्व के बोध से दुनिया में यश मिल रहा है। "आसुरी ताकतें जानती है कि भारत की इस प्रकार की प्रगति से उनके षडयंत्रकारी ताकतों के खेल बंद होंगे, इसलिए भारत ही उसका निर्णायक और सब से बलवान प्रतिस्पर्धी और अंतिम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है।"
उन्होंने कहा , "वे ताकतें भारत, हिंदू और संघ को किस प्रकार तोड़ सकती हैं, इसका विचार कर योजना बना कर कार्य करती हैं । उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग इसमें उन्हें सहायता के लिये मिल जाते हैं । क्षुद्र सत्तास्वार्थ तथा विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते हैं ।" संघ प्रमुख ने कहा ," भारत जैसे बड़े समाज में समस्याएँ जरूर है । व्यवस्था की कमियाँ भी ढेर सारी हो सकती हैं, उनके चलते आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक ही है । परन्तु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए । अपने अखंड समाज में हमारी करनी के कारण किसी प्रकार की अनबन, द्वेष, मलाल या विभाजन पैदा नहीं होना चाहिए, भावनाएं तीव्र होने पर भी हमारे संविधान कानून की मर्यादा में, बोल चाल और आचरण के भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियाँ हों, यह ध्यान रखना चाहिए ।"
उन्होंने कहा, " वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक और सद्भावना पर हावी न हो यह चिंता करनी ही पड़ेगी।" श्री भागवत ने कहा, " जब ऐसी स्थिति न होकर आंदोलन राजनीति का साधन बन जाता है, किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोधी शत्रुभाव लेकर चलता है तब इसका लाभ भारत को दबाना चाहने वाली शक्तियां उठाती हैं ।" मतभेदों को और गहरा बनाकर मनभेद उत्पन्न करना, समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में अन्यायग्रस्तता की भावना और उत्पन्न करना , देश की व्यवस्थाओं के बारे में अश्रद्धा उत्पन्न करना, कलह, उग्र असंतोष, अलगाव, अव्यवस्था और अराजकता का वातावरण बनाना यह ऐसी शक्तियों की कार्यपद्धति है।
संघ प्रमुख ने कहा कि भारत को दबाकर रखना चाहने वाली विश्व की शक्तियां भी कभी कभी इसमें अपना खेल करती रहती है । इसी संदर्भ में श्रीमती आशा भोंसले के गाये , पी. सावळाराम रचित एक बहुत पुराने मराठी गीत की इन पंक्तियों का उल्लेख करते हुए देश वासियों को ऐसी ताकतों के प्रति सावधान किया किया जिनमें कहा गया है- "वाढवीत भेदभावा दुष्टतेचा फिरतो कावा गाठूनिया भोळ्या जीवा अंधारात घालिल घावा" (भोले-भाले लोगों को पकड़ कर भेद भाव बढ़ाते हुए दुष्टता अंधेरे में से आघात कर रही है।) इसलिए - "चित्त नित्य सावध ठेवा एक लक्ष्यि लावून डोळे" (सावधान हों कर लक्ष्य पर केंद्रित हो जाएँ।) उन्होंने कहा कि देश के लोगों को ऐसी विभेदकारी प्रवृत्तियों की चालों के चपेट से बचते हुए अपनी परस्पर सद्भावना की रक्षा करनी होगी । " हमें सावधान रह कर किसी प्रकार से उद्वेलित, उत्तेजित न होते हुए, भारत को विश्वगुरु पद पर देखने की अपनी आकांक्षा व लक्ष्य नित्य ध्यान में रखते हुए हमें प्रयासरत रहना होगा ।... वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ हमारे विवेक व सद्भावना पर हावी न हो ,यह चिंता करनी ही पड़ेगी। उन्होंने कहा, ' समाज की सब समस्याएं शासन ही सुलझा सकता है अथवा आन्दोलनों से ही समस्याएं सुलझती है ऐसा भी अनुभव नहीं है। समाज की सक्रियता और आपसी संवाद के आधार पर भी समस्याओं का समाधान निकल सकता है।
मनोहर जितेन्द्र वार्ता

