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गुरुदत्त ने संवेदनशील फिल्मों से भारतीय सिनेमा को दी नई पहचान

(जयंती 09 जुलाई के अवसर पर)मुंबई, 09 जुलाई (वार्ता) गुरुदत्त को ऐसे फिल्मकार के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने अपनी संवेदनशील फिल्मों, उत्कृष्ट निर्देशन और सशक्त कहानी कहने की शैली से हिंदी सिनेमा को नई दिशा दी।
09 जुलाई 1925 को कर्नाटक के बेंगलूरु में एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में जन्मे गुरुदत्त का वास्तविक नाम वसंत कुमार शिवशंकर राव पादुकोण था। बचपन से ही उनका रुझान संगीत और नृत्य की ओर था। उनके पिता शिवशंकर पादुकोण स्कूल में प्रधानाध्यापक थे, जबकि उनकी मां शिक्षिका थीं। गुरुदत्त की प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता में हुई, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उन्हें मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी।
नृत्य के प्रति अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने चाचा की सहायता से छात्रवृत्ति प्राप्त की और अल्मोड़ा स्थित उदय शंकर इंडिया कल्चर सेंटर में प्रवेश लिया, जहां उन्होंने उदय शंकर से नृत्य का प्रशिक्षण लिया। इस दौरान उन्होंने एक मिल में टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में भी काम किया। प्रशिक्षण पूरा करने के बाद वह पुणे के प्रभात फिल्म कंपनी से तीन वर्ष के अनुबंध पर बतौर नृत्य निर्देशक जुड़े। वर्ष 1946 में उन्होंने फिल्म हम एक हैं से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की। इसी दौरान उन्हें प्रभात स्टूडियो की कुछ फिल्मों में अभिनय का अवसर भी मिला।
प्रभात स्टूडियो से अनुबंध समाप्त होने के बाद वह मुंबई लौट आए और कहानियां लिखने लगे। इसी दौरान उन्होंने प्यासा की कहानी लिखी, जिस पर बाद में उन्होंने अपनी कालजयी फिल्म बनाई। वर्ष 1951 में देव आनंद अभिनीत फिल्म बाजी के निर्देशन से उन्हें बड़ी सफलता मिली और बतौर निर्देशक उनकी पहचान स्थापित हो गई। इसी फिल्म के निर्माण के दौरान उनका झुकाव गायिका गीता राय की ओर हुआ और दोनों ने वर्ष 1953 में विवाह कर लिया।
इसी वर्ष अभिनेत्री गीता बाली की बड़ी बहन हरिदर्शन कौर के साथ मिलकर गुरुदत्त ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा, लेकिन फिल्म बाज की असफलता के बाद उन्होंने अलग होकर अपनी निर्माण कंपनी स्थापित की। इसके बैनर तले उन्होंने वर्ष 1954 में आर-पार का निर्माण किया, जिसने शानदार सफलता हासिल की। इसके बाद उन्होंने सीआईडी, प्यासा, कागज़ के फूल, चौदहवीं का चाँद और साहिब बीबी और गुलाम जैसी कालजयी फिल्मों का निर्माण किया। उन्होंने बाजी, जाल और बाज जैसी फिल्मों की पटकथा भी लिखी तथा लाखारानी, मोहन, गर्ल्स हॉस्टल और संग्राम जैसी फिल्मों का सह-निर्देशन भी किया।
वर्ष 1953 में बाज से उन्होंने अभिनय के क्षेत्र में भी कदम रखा। इसके बाद उन्होंने सुहागन, आर-पार, मिस्टर एंड मिसेज़ 55, प्यासा, 12 ओ'क्लॉक, कागज़ के फूल, चौदहवीं का चाँद, सौतेला भाई, साहिब बीबी और गुलाम, भरोसा, बहूरानी, सांझ और सवेरा तथा पिकनिक जैसी फिल्मों में यादगार अभिनय किया।
आर-पार की सफलता के बाद गुरुदत्त की गिनती हिंदी सिनेमा के श्रेष्ठ निर्देशकों में होने लगी। प्यासा और मिस्टर एंड मिसेज़ 55 जैसी फिल्मों ने उनकी प्रतिभा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। हालांकि वर्ष 1959 में कागज़ के फूल की व्यावसायिक असफलता से वह इतने आहत हुए कि उन्होंने भविष्य में निर्देशन नहीं करने का निर्णय लिया। माना जाता है कि वर्ष 1962 की साहिब बीबी और गुलाम का निर्देशन भी उन्होंने ही किया था, लेकिन इसका श्रेय उन्होंने फिल्म के लेखक अबरार अल्वी को दिया।
वर्ष 1957 के बाद गुरुदत्त और गीता दत्त के वैवाहिक संबंधों में दरार आ गई और दोनों अलग रहने लगे। उस समय उनका नाम अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ भी जोड़ा गया। निजी जीवन के तनाव ने उन्हें गहरे अवसाद में धकेल दिया और उन्होंने शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया।
10 अक्टूबर 1964 को अत्यधिक मात्रा में नींद की गोलियां लेने के कारण गुरुदत्त का निधन हो गया। उनकी मृत्यु आज भी रहस्य और चर्चाओं का विषय बनी हुई है। अपने छोटे से जीवनकाल में उन्होंने जो फिल्मी विरासत छोड़ी, वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगी।
प्रेम
वार्ता
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