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पाण्डुलिपियों में संरक्षित ज्ञान को विद्वानों, छात्रों, लोगों तक पहुंचाना ज़रूरी : संस्कृति सचिव

नयी दिल्ली, 31 जुलाई, (वार्ता) नयी दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) द्वारा आयोजित ‘भगवद्गीता एवं नाट्यशास्त्र का यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड के इंटरनेशनल रजिस्टर में अभिलेखन’ पर केन्द्रित दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का गुरुवार देर शाम समापन हुआ।

समापन सत्र आईजीएनसीए, नयी दिल्ली के समवेत सभागार में आयोजित हुआ। इस सत्र के मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्री विवेक अग्रवाल थे और इसकी अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) एवं कला निधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत भाषण दिया और दो दिनों में हुई गतिविधियों का सार प्रस्तुत किया।

समापन सत्र में श्री अग्रवाल ने कहा कि भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र का यूनेस्को की ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर’ में अंकन होना राष्ट्र के लिए गर्व का क्षण है। यह उपलब्धि ‘ज्ञान भारतम् मिशन ऑन मैन्यूस्क्रिप्ट्स’ के शुभारंभ के साथ-साथ आई है, जिसका उद्देश्य केवल पाण्डुलिपियों का संरक्षण नहीं, बल्कि उनमें संचित ज्ञान को विद्वानों, छात्रों और सामान्य लोगों तक सक्रिय रूप से पहुंचाना भी है।

उन्होंने पूरे देश में संस्थानों और व्यक्तियों का एक ऐसा नेटवर्क बनाने की योजना पर बल दिया, जो सूचना साझा करने, क्षमता निर्माण और निजी ट्रस्टों व धार्मिक संस्थाओं सहित पाण्डुलिपि-संग्रहण केन्द्रों के लिए वित्त पोषण सुनिश्चित कर सके। उन्होंने यह भी कहा कि प्राचीन लिपियों को समझना और इतिहास में विद्यमान रिक्तियों को भरना आज आवश्यक है, जिसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग जैसी उन्नत तकनीकों की सहायता से संभव किया जा सकता है।

उन्होंने बताया कि भविष्य के यूनेस्को नामांकनों के लिए एक राष्ट्रीय रजिस्टर का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, जिसमें विशिष्ट पाण्डुलिपियों और दस्तावेजों को संकलित किया जाएगा और इसके लिए आईजीएनसीए को संस्थागत केंद्र के रूप में प्रस्तावित किया गया है। उन्होंने अभिलेखों (एपिग्राफी) और दुर्लभ दृश्य सामग्री जैसे सहायक प्रयासों को भी इस व्यापक ढांचे में सम्मिलित करने की बात कही। पिपरहवा अवशेषों की देश में वापसी का उल्लेख करते हुए उन्होंने इसे सार्वजनिक-निजी सहभागिता का एक आदर्श उदाहरण बताया। पिपरहवा अवशेष में भगवान बुद्ध की अस्थियों के टुकड़े, क्रिस्टल के पात्र, सोने के आभूषण और अन्य चढ़ावे शामिल थे, जो बौद्ध परम्परा के अनुसार स्तूप में रखे गए थे। ये पवित्र वस्तुएं 1898 में ब्रिटिश अधिकारी विलियम क्लॉक्सटन पेप्पे द्वारा उत्तर प्रदेश के पिपरहवा स्तूप की खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थीं।

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. जोशी ने कहा कि यूनेस्को ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड’ नामांकन के संदर्भ में आईजीएनसीए की भूमिका निरंतर बढ़ रही है और हाल ही में जिन डोजियर का निर्माण हुआ, वे पूरी तरह से आईजीएनसीए के विद्वानों द्वारा तैयार किए गए हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि छह देशों के प्रतिनिधियों के साथ आयोजित अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला के माध्यम से आईजीएनसीए अब क्षमता निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है। डॉ. जोशी ने सितंबर में भारत मंडपम में आयोजित होने वाले ‘ज्ञान भारतम मिशन’ पर आधारित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की ज़िम्मेदारी आईजीएनसीए को सौंपे जाने के लिए मंत्रालय का आभार प्रकट किया।

उन्होंने वर्तमान में चल रही परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें कल्हण के राजतरंगिणी की मूल शारदा पांडुलिपि का पता लगाना तथा ‘लोकतंत्र की जननी’ के रूप में भारत के दावे को पुष्ट करने वाले उत्तरमेरु शिलालेखों का पूर्ण दस्तावेज़ीकरण सम्मिलित है। उन्होंने संगोष्ठी में भाग लेने वाले सभी प्रतिष्ठित विद्वानों और युवा शोधार्थियों का धन्यवाद ज्ञापित किया।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा कि अब आईजीएनसीए क्षमता निर्माण का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है। उन्होंने जानकारी दिया कि आईजीएनसीए वर्तमान में सात नए नामांकन के लिए डोजियर तैयार कर रहा है। चार इंटरनेशनल रजिस्टर और तीन रीजनल रजिस्टर के लिए। इंटरनेशनल रजिस्टर के लिए तैयार किए जा रहे नामांकनों में वाल्मीकि रामायण, तिरुक्कुरल और नेपाल के साथ संयुक्त रूप से अशोक के अभिलेख तथा हंगरी के साथ एक संयुक्त नामांकन शामिल हैं। हंगरी के साथ संयुक्त नामांकन में चित्रकार एलिज़ाबेथ ब्रूनर और एलिज़ाबेथ सॉस ब्रूनर का उल्लेखनीय कार्य सम्मिलित है। इनमें कई दुर्लभ चित्र महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ ठाकुर से संबंधित हैं, जो भारत के सांस्कृतिक अभिलेख का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

इससे पूर्व, संगोष्ठी के दूसरे दिन ‘भगवद्गीता’ और ‘नाट्यशास्त्र’ से जुड़े कई विषयों पर विद्वानों, शिक्षाविदों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने चार सत्रों में गहन चर्चा की।

यह संगोष्ठी न केवल भारत की शास्त्रीय बौद्धिक परम्परा को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम रही, बल्कि इसने युवाओं और शोधार्थियों को भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा दी।

मनोहर.अभय

वार्ता
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