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आधुनिकता की आंधी में विलुप्ति के कगार पर भारतीय लोक वाद्य परंपरा

औरंगाबाद, 07 मई (वार्ता) भारतीय लोक संस्कृति और परंपरा के प्रतीक ढोल, बांसुरी, डफली जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्र आज आधुनिकता की तेज रफ्तार में विलुप्त होने के कगार पर है। कभी गांव-समाज की आत्मा माने जाने वाले ये लोक बाजे अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। ग्रामीण अंचलों में प्रचलित सिंघा, मोर बाजा, ताशा, मांदर, शहनाई और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्र न केवल संगीत के साधन थे, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के अभिन्न अंग भी हुआ करते थे। इनकी मधुर ध्वनियों से वातावरण में उल्लास, सौहार्द और आत्मीयता का संचार होता था। शादी-विवाह, पर्व-त्योहार, धार्मिक अनुष्ठान और…

समाचार विवरण:

कुल शब्द:
100
टाइप:
टेक्स्ट
यूआरएल स्लग:
बिहार लोक वाद्य परंपरा
स्रोत:
UNI Varta
कैटेगरी
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प्रकाशित तिथि
07/05/26 00:00
पिछला अपडेट
07/05/26 00:00
स्थान
India