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न्यायपालिका की आलोचना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है : न्यायमूर्ति ओक

नागपुर, 23 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अभय ओक ने कहा है कि किसी भी संवैधानिक संस्था को अपने आप में पूर्ण नहीं माना जाना चाहिए और न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। नागपुर के धरमपेठ स्थित वनमती सभागार में शनिवार को डांडे फाउंडेशन की ओर से आयोजित एक व्याख्यान को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति ओक ने कहा कि हर दूसरी संस्था की तरह न्यायपालिका में भी कमियां हैं और सकारात्मक सुधार लाने के लिए रचनात्मक आलोचना आवश्यक है। उन्होंने कहा, "कोई भी संस्था गलतियों से परे नहीं होती। न्यायपालिका में भी कई कमियां हैं…

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100
टाइप:
टेक्स्ट
यूआरएल स्लग:
महाराष्ट्र ओक व्याख्यानमाला
स्रोत:
UNI Varta
कैटेगरी
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प्रकाशित तिथि
23/08/26 10:32
पिछला अपडेट
23/08/26 10:32
स्थान
India