जालौन 03 अप्रैल (वार्ता) उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में इतिहास की परछाई में दबी कई आध्यात्मिक, पौराणिक और ऐतिहासिक धरोहरें आज भी हमारे बीच मौजूद हैं, लेकिन कालचक्र की उथल-पुथल में इनका इतिहास कहीं विलुप्त हो चुका है। ऐसी ही एक अनमोल धरोहर है “ अक्षरा देवी धाम पीठ”। यह मंदिर अपनी आध्यात्मिक एवं प्राकृतिक विशेषताओं के कारण क्षेत्र का एक प्रमुख आकर्षण केंद्र माना जाता है।
जालौन जिला मुख्यालय उरई से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अक्षरा पीठ का मंदिर, बेतवा नदी के किनारे सैदनगर में स्थित है। यह कानपुर-झांसी रेलमार्ग पर एट जंक्शन से लगभग 12 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में कोटरा रोड के निकट ग्राम कुरकुरू से एक लिंक मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क उपलब्ध है, जिससे श्रद्धालु किसी भी वाहन द्वारा यहां आसानी से आ सकते हैं।
आचार्य अंकित शास्त्री ने बताया कि यह शक्तिपीठ वैदिक काल के बाद तांत्रिक काल में भी विशेष महत्व रखता था। इस स्थल को जगदम्बा उपासना की सिद्धि पीठ माना जाता है। पुरातन काल में यह क्षेत्र एक त्रिकोण के रूप में विद्यमान था, जिसके तीनों स्थान बेतवा नदी के किनारे स्थित थे। समय के साथ नदी का प्रवाह परिवर्तित हुआ और यह त्रिकोणीय स्थिति भी परिवर्तित हो गई। यह शक्तिपीठ इस त्रिकोण का अभिन्न हिस्सा रहा है, जिसे साधकों द्वारा गायत्री पीठ, त्रिपुर सुंदरी पीठ और महालक्ष्मी पीठ के रूप में मान्यता दी जाती रही है।
पुजारी संतोष पांडा राजू देवोलिया ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मांड में सर्वप्रथम लिपि का उद्भव इसी स्थान से हुआ था। अक्षरा शब्द स्वयं ही माता की उस आराधना का प्रतीक है, जहां ब्रह्म की निष्क्रिय अवस्था में भी ब्रह्मीय शक्ति के संयोग से सृजन की कल्पना की गई। इसी कारण माता को अक्षरा कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है जो कभी नष्ट न हो। धार्मिक विश्वासों के अनुसार यह स्थान सृजन, ऊर्जा और दिव्य चेतना का केंद्र है।
शक्तिपीठ मां अक्षरा धाम न केवल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, बल्कि साधना और मोक्ष प्राप्ति का भी सर्वोत्तम स्थल माना जाता है। यहां मंदिर के अंदर बलि नहीं दी जाती और न ही मां के सामने नारियल तोड़ा जाता है। इसी प्रकार, मंदिर परिसर के भीतर तेल का दीपक नहीं जलाया जाता और नारियल की बलि भी वर्जित है। यदि श्रद्धालु नारियल तोड़ना चाहें, तो उन्हें इसे मंदिर के पीछे स्थित पहाड़ पर करना होता है। तिल और जवा का हवन भी मंदिर परिसर के भीतर न होकर पीछे की वेदी पर किया जाता है। मां के समक्ष यदि हवन करना हो, तो उसे केवल चंदन, धूप तथा औषधीय लकड़ियों के साथ घी और शक्कर का उपयोग कर किया जाता है।
तामसी एवं राजसी पदार्थों के बिना मां की आराधना की जाती है, जिससे साधकों की भावनाएं शुद्ध होती हैं। मां अक्षरा का यह धाम पवित्र वेत्रवती नदी के तट पर स्थित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह नदी भगवान शिव के अश्रुपात का प्रवाह है। जब देवी सती ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ में स्वयं को हवनकुंड में समर्पित कर दिया, तब भगवान शिव क्रोधित हुए और उनके नेत्रों से अश्रु प्रवाहित हुए, जो वेत्रवती नदी का रूप ले गए। धार्मिक ग्रंथों में वेत्रवती को गंगा के समान पवित्र माना गया है।
वेत्रवती तट (बतावा )को मोक्षदायक माना जाता है, जहां पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि से मुक्ति प्राप्त होती है। यह स्थान तंत्र साधना के लिए भी उपयुक्त माना गया है। कई धर्मशास्त्रों के अनुसार, वेत्रवती को 'कलियुग की गंगा' कहा जाता है। पहले हर वर्ष बारिश के दौरान वेत्रवती अपने जल से मंदिर में प्रवेश कर मां के चरण पखारती थी, किंतु हाल के वर्षों में मौसम परिवर्तन के कारण यह परंपरा बाधित हो गई है।
मां अक्षरा धाम के सामने एक प्राकृतिक कुण्ड स्थित है, जिसे सैदोलक जल का स्रोत माना जाता है। यह जल अत्यंत विशिष्ट होता है और इसे प्राप्त करने के लिए सही मुहूर्त में विशेष प्रयास करने पड़ते हैं। आयुर्वेदिक ग्रंथों के अनुसार, सैदोलक जल में धातुओं को परिवर्तित करने की क्षमता होती है। कहा जाता है कि इस जल से लकड़ी पत्थर में, पत्थर मणि में और धातु स्वर्ण में परिवर्तित हो सकता है।
नवरात्रि के दौरान इस मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है। श्रद्धालु पूरे नौ दिनों तक यहां प्रवास करते हैं और मां की आराधना में लीन रहते हैं। चैत्र नवरात्र के बाद एकादशी को यहां विशेष मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से भक्तगण आते हैं।
माना जाता है कि ब्रह्माण्ड में सर्वप्रथम लिपि की उत्पत्ति इसी स्थान से हुई थी। किंवदंतियों के अनुसार, मनुष्य की बोली को सर्वप्रथम भगवान शिव ने अपने डमरू के नाद से स्वर रूप में व्यवस्थित किया, जिसके बाद लिपि का विकास हुआ। इसी संदर्भ में शक्तिपीठ मां अक्षरा देवी मंदिर का विशेष महत्व है, जहां देवी किसी प्रतिमा या पिंडी के रूप में नहीं, बल्कि एक विशेष यंत्र रूप में विराजमान हैं।
शास्त्रों के अनुसार, देवी मंदिरों में मां आदिशक्ति प्रायः प्रतिमा या पिंडी के रूप में पूजित होती हैं, परंतु मां अक्षरा देवी मंदिर में गर्भगृह में देवी साढ़े तीन मात्राओं के एक यंत्र के रूप में स्थापित हैं। यह एक अनूठी परंपरा है, जिसके कारण यहां केवल बौद्धिक साधना को ही मान्यता प्राप्त है। यंत्र रूप में देवी की पूजा विशेष फलदायी होती है और यह स्थान स्वयं सिद्ध शक्तिपीठों में से एक है।
आचार्य का कहना है कि श्री दुर्गा सप्तशती के तंत्रोक्त रात्रिसूक्तम् में स्वयं परमपिता ब्रह्मा जी ने अक्षरा देवी की स्तुति की है। यहां किसी प्रकार की सिद्धि करने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि यह स्थान पहले से ही सिद्ध माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस मंदिर में मां अक्षरा देवी की साधना करने से विद्या, बुद्धि और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि यह स्थान विद्वानों और साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
सं सोनिया
वार्ता