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आरक्षण नीति का बचाव करने वाले हलफनामे पर आलोचनाओं से घिरी जम्मू- कश्मीर सरकार

श्रीनगर,05 अप्रैल (वार्ता) जम्मू-कश्मीर सरकार के अपनी विवादास्पद आरक्षण नीति को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करने की मांग को लेकर उच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल करने के बाद एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है और विपक्षी राजनीतिक दलों ने इसकी तीखी आलोचना की है।
सरकार ने याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करार देते हुए इसे भारी जुर्माने के साथ शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिये जाने का आग्रह किया है।
राज्य के समाज कल्याण विभाग ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय में अपने वकील के जरिए पेश हलफनामे में तर्क दिया कि याचिका बिना किसी कारण के तथा न्यायपालिका को गुमराह करने के उद्देश्य से गलत इरादे से दायर की गयी है।
सरकार ने हलफनामे में तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय को धोखा देने के प्रयास में पूरी तरह से झूठे आधार पर वर्तमान याचिका दायर की है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि याचिकाकर्ताओं ने खुद को असाधारण रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने के लिए कैसे अधिकृत किया है, जबकि केंद्रशासित जम्मू-कश्मीर की ओर से जारी विवादित वैधानिक आदेश से पूर्व में घोषित जनजातियों के लिए आरक्षण के प्रतिशत को कम नहीं किया गया है।
हलफनामे में यह भी कहा गया है कि अगर याचिका को अनुमति दी जाती है, तो इससे एक गलत मिसाल कायम होगी तथा उन बेईमान वादियों को प्रोत्साहित करेगी, जो न्यायालय के कीमती समय और संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं।
इस बीच सरकार के इस रुख पर राजनीतिक नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष एवं हंदवाड़ा के विधायक सज्जाद लोन ने कहा,“जहूर अहमद भट और अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर संघ शासित प्रदेश के मामले में जम्मू कश्मीर सरकार की ओर से कल उच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में आरक्षण से संबंधित याचिका को निराधार बताते हुए इसे पूरी तरह खारिज करने की मांग की गयी है। सरकार ने आरक्षण पर उप समिति के गठन का कहीं भी उल्लेख नहीं किया है। यह एक कानूनी रहस्य है।”
पीपुल्स उेमोक्रेटिक नेता एवं पुलवामा के विधायक वहीद पारा ने भी सरकार पर निशाना साधते हुए उस पर दोषपूर्ण आरक्षण नीति को संरक्षण देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तथाकथित कैबिनेट समिति जनता को गुमराह करने के लिए एक दिखावा मात्र थी तथा अब वे रिट याचिका को निराधार बताकर खारिज करने की कोशिश कर रहे हैं जो जम्मू कश्मीर में मेधावी छात्रों के भविष्य को बर्बाद करने का एक और प्रयास मात्र है।
इस बीच आरक्षण नीति की फिर से जांच करने के लिए गठित तीन सदस्यीय पैनल की प्रमुख शिक्षा मंत्री सकीना इटू ने कहा कि वह परामर्श कर रही हैं और निर्धारित छह महीने के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगी। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्री इस मुद्दे पर बहुत गंभीर हैं और हमें समिति द्वारा हितधारकों के साथ की जाने वाली बैठकों के बारे में उन्हें दैनिक आधार पर अपडेट करना होगा।”
उन्होंने उन नेताओं पर भी निशाना साधा जो हमेशा सरकार को निशाना बनाने की कोशिश करते हैं।
गौरतलब है कि नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की मौजूदा संरचना को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में कम से कम तीन याचिकाएं दायर की गयी हैं।
अशोक,आशा
वार्ता
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