नयी दिल्ली, 19 अक्टूबर (वार्ता) भारत से एक हजार वर्ष से अधिक समय पहले पलायन कर यूरोप और अमेरिका में फैले रोमा समुदाय के लोगों को उनके मूल से जोड़ने के उद्देश्य से सरकार अगले वर्ष क्रोएशिया में एक बड़ा सम्मेलन आयोजित करेगी।
विदेश मंत्रालय के अधीन अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) के महानिदेशक दिनेश पटनायक ने सोमवार देर शाम पत्रकारों से बातचीत में कहा कि इराक, सीरिया, लेबनान, तुर्की, यूनान, हंगरी, रोमानिया, क्रोएशिया, स्पेन, इटली, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, ब्राजील आदि अनेक देशाें में फैले रोमा समुदाय के दो करोड़ से अधिक लोगों के साथ भारत की सांस्कृतिक डोर को मजबूत करने के उद्देश्य से सरकार पहली बार विदेश में यह सम्मेलन आयोजित करेगी।
श्री पटनायक ने कहा कि यह सम्मेलन वर्ष 2022 में अप्रैल माह में क्रोएशिया की राजधानी जाग्रेब में आयोजित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि सम्मेलन मुख्यत: रोमा समुदाय के साथ सांस्कृतिक संबंधों को पुन: जीवंत बनाना, उनके साथ कारोबारी आदान प्रदान करना, उन्हें एक सांस्कृतिक शक्ति के रूप में संगठित करने पर केन्द्रित होगा।
रोमा समुदाय को उनके देशों में घुमक्कड़ या जिप्सी संस्कृति के वाहक के रूप में देखा जाता है। इनके मूल के बारे में यूरोप में हुए एक शोध में उनके वाई क्रोमोसोम एकत्र कर उनकी डीएनए संरचना का अध्ययन किया गया और रोमा समुदाय के सैकड़ों लोगों के डीएनए से मिलान कराया तो वह सिर्फ भारत में अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्गों में आने वाली कुछ जातियों के डीएनए से मेल खा रहे थे। इससे उनके भारतीय मूल का पता चला।
अध्ययन से पता चला कि ये लोग महमूद गजनवी के आक्रमण के कालखंड में कन्नौज, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान के क्षेत्रों से इराक से लेकर उत्तर यूरोप तक फैल गये थे। इनका पलायन क्यों हुआ था, इसके बारे में कोई मान्य तथ्य ज्ञात नहीं है। कुछ इतिहासकार हालांकि यह मानते है कि रोमा लोगों को हजारों की संख्या में महमूद गजनवी द्वारा गुलाम बनाकर अफगानिस्तान ले जाया गया था। पन्द्रहवीं शताब्दी के आस-पास वे आजाद होकर यूरोप चले गए थे। रोमा समुदाय यूरोप के कई देशों में बिखरा हुआ है। उनके रहन-सहन, संगीत-नृत्य, भाषा आदि पर आज भी भारतीयता का प्रभाव साफ झलकता है। भारत छोड़ने के बाद रोमा जहाँ भी गए, उन्हें वहाँ की स्थानीय बोली सीखनी पड़ी। शायद इसलिए उनकी भाषा और व्याकरण में काफी बदलाव आया लेकिन सैकड़ों साल पश्चिम एशिया और यूरोप में भटकने के बावजूद रोमा भाषा आज भी पश्चिम भारतीय बोलियों-राजस्थानी, पंजाबी और गुजराती के बहुत करीब है। रोमा समुदाय की भाषा में तीन हजार से अधिक शब्द हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के हैं। उनकी पूजा पद्धति भी काफी हद तक भारतीय हिन्दू पूजा पद्धति जैसी है। वे नदियों, वृक्षों की पूजा करते हैं और काली की पूजा करते हैं। दुर्गा पूजा जैसा आयोजन करते हैं। रोमा समुदाय की मशहूर हस्तियों में जानी मानी पाॅप गायिका मैडोना, मशहूर हास्य कलाकार चार्ली चैप्लिन, अभिनेता बॉब हाॅस्किंस, चित्रकार पाब्लो पिकासो आदि थे।
यूरोप में रोमा-विरोधी अभियानों का लंबा इतिहास रहा है। घुमंतू प्रवृत्ति के होने के नाते उन्हें उनके देशों में हेय दृष्टि से देखा जाता है। उनके मानवाधिकारों के हनन की शिकायतें भी आम हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजीपरस्त फ्रांसीसी सरकार ने भी रोमा समुदाय के हजारों लोगों को जर्मनी खदेड़ दिया था। नाजियों ने भी रोमा समुदाय पर भयंकर अत्याचार किए थे। हिटलर के आदेश पर यहूदियों की ही तरह, यूरोप भर में पांच लाख रोमा को मौत के घाट उतार दिया गया था।
भारत के साथ रोमा समुदाय की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों का पता लगाने के लिए आईसीसीआर ने फरवरी 2016 में एक शैक्षिक सम्मेलन का आयोजन किया था। सम्मेलन का मकसद विश्व स्तर पर रोमा के बारे में अधिक जागरुकता पैदा करना और शैक्षिक और वैज्ञानिक संरचनाओं के विकास की दिशा में उपयोगी संकेत प्रदान करना और दुनिया भर में रोमा समुदाय द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों के लिए समाधान खोजने में मदद करना है। इससे पूर्व 1983 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा सर्वप्रथम रोमा समुदाय के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।
एक अध्ययन में माना गया है कि रोमा समुदाय ने ईमानदारी से भारतीय विरासत की सांस्कृतिक और पारंपरिक प्रथाओं को बनाए रखा है। तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उस सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा था कि रोमा और भारत के बीच सांस्कृतिक संबंध शोध का विषय रहा है और इस शोध का ध्यान से संरक्षण और दस्तावेजीकरण करने की जरूरत है।
पांच वर्ष पहले आयोजित इस सम्मेलन के निष्कर्षों एवं सिफारिशों के आधार पर क्रोएशिया में इस सम्मेलन में आयोजन का निर्णय किया गया है।
सचिन.श्रवण
वार्ता