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दोनों समुदायों के बीच शीघ्र ही अंतिम चरण की वार्ता होने वाली, मणिपुर में शांति है: शाह

दोनों समुदायों के बीच शीघ्र ही अंतिम चरण की वार्ता होने वाली, मणिपुर में शांति है: शाह

नयी दिल्ली 03 अप्रैल (वार्ता) केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरूवार देर रात राज्यसभा में बताया कि मणिपुर में 13 नवंबर से लेकर अब तक एक भी हिंसा नहीं हुयी है और अब दोनों समुदायों के बीच वार्ता चल रही तथा शीघ्र ही राजधानी दिल्ली में अंतिम बैठक होने वाली है। इसके साथ ही सदन ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाये जाने से जुड़े सांवधिक संकल्प को ध्वनिमत से मंजूर दिया। लोकसभा पहले ही इसे मंजूर कर चुकी है।
श्री शाह ने इस संकल्प पर हुयी चर्चा का जबाव देते हुये कहा कि इस पर चर्चा में 10 सदस्यों ने भाग लिया है। उन्होंने कहा कि एक गलत निर्णय के बाद यह हिंसा भड़की थी। उच्चतम न्यायालय ने उस निर्णय को दूसरे ही दिन रोक लगा दिया था लेकिन हिंसा भड़क गयी। इस हिंसा में कुल मिलाकर 260 लोग मारे गये हैं और पहले 15 दिनों में ही 70 प्रतिशत लोगों की मौत हुयी थी। भारत सरकार की राय लिये बगैर ट्राइबल न्यायाधिकरण ने एकसमुदाय को आदिम जाति में डाल दिया था। इसको लेकर यह हिंसा भड़की थी। उन्होंने कहा कि दोनों समुदायों के बीच 13 बार बैठक हुयी है। सदन में इस संकल्प को लाने में विलंब भी इसी वजह से हुयी है। दोनों समुदाय की अंतिम बैठक शीघ्र ही दिल्ली में होने वाली है। संवाद के साथ ही शांति स्थापित होगी और राष्ट्रपति शासन हटा दिया जायेगा। भाजपा राष्ट्रपति शासन लगाने के पक्ष में नहीं है।
श्री शाह ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 356 ए के तहत मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाया गया है। राष्ट्रपति शासन किसी भी स्थिति में इसी के तहत से लगाया जाता है। कांग्रेेस के कार्यकाल में विपक्ष की सरकार गिराने के लिये राष्ट्रपति शासन लगाया जाता था। कानून और व्यवस्था के नाम पर भी राष्ट्रपति शासन लगाया जाता रहा है लेकिन भारतीय जनता पार्टी इसके पक्ष में नहीं है। उन्होंने सदन को बताया कि 11 फरवरी को मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया था। मणिपुर में कांग्रेस के पास इतना संख्या बल ही नहीं था कि वह अविश्वास प्रस्ताव ला सके। किसी ने भी सरकार के गठन का दावा नहीं किया तब राष्ट्रपति शासन लगाने का निर्णय लिया गया। राष्ट्रपति शासन 13 फरवरी को लगा था लेकिन 13 नवंबर 2024 से लेकर अब तक राज्य में कोई हिंसा नहीं हुयी है।
उन्होंने कहा कि 70 प्रतिशत लोग हिंसा भड़कने के पहले 15 दिन में मारे गये थे। पहले 15 दिन नियंत्रित करना कठीन होता है। यह पहली बार मणिपुर में नहीं हुआ है। मोदी सरकार ने तो पहली बार राष्ट्रपति शासन लगाया है। मणिपुर में 10 बार किसने लगाया था। 1993-98 के दौरान नागा कुकी संघर्ष हुआ और 750 लोग मरे लेकिन प्रधानमंत्री नहीं गये।
गृह मंत्री ने कहा कि 13 फरवरी 2025 के सात साल पहले इतनी ही मजबूत सरकार कांग्रेस की थी। एक वर्ष में 225 दिन नाकेबंदी और कर्फ्यू रहा था। उस समय भी प्रधानमंत्री नहीं गये थे।
उन्होंने कहा कि जातीय हिंसा और नक्सली हिंसा अगल है लेकिन वामपंथी सदस्य को यह पता होना चाहिए कि जातीय हिंसा में शांति बनायी जाती है लेकिन नक्सली हिंसा से निपटना होता है। देश के खिलाफ हिंसा और जातीय हिंसा में अंतर है। दो साल से इतनी सारी हिंसा होने पर विपक्ष जिस तरह की बात की है वह आश्चर्यचकित करने वाला है। कई महिलाओं के साथ दुव्यर्वहार हुआ है। पश्चिम बंगाल में संदेशखली में महिलाओं के साथ वर्षाें तक दुर्व्यवहार किया गया था। आर जी कार मामले में भी कुछ नहीं किया गया। मणिपुर में 260 लोग मारे गये । पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा में 250 से अधिक लोग मार दिये गये हैं।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस दो सीट को लेकर सबक सीखने की बात कह रही है जबकि देश की जतना पिछले तीन चुनाव से इनको सबक सीखा रही है। 2004 से 2014 के दौरान पूर्वाेत्तर में 11327 घटनाये हुयी थी लेकिन 2014 से 24 के दौरान 70 प्रतिशत कम 3428 घटनायें हुयी है। पूर्वाेत्तर में हिंसा करने वाले समुदायों के साथ समझौते किये गये हैं। 10 हजार युवाओं ने आत्मसमर्पण किया है।
इससे पहले विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने चर्चा की शुरूआत करते हुये कहा कि सरकार हिंसा रोकने में असफल रही है। 260 लोग मारे गये हैं। 60 हजार लोग विस्थापित हुये है। हजारों घर, दुकान और धर्मस्थल को जला दिया गया है। 4700 से अधिक घर जला दिये गये हैं। मई 2023 से लेकर अबतक तीन हजार से अधिक बलात्कार, हत्या और लूटपाट की प्राथमिकी दर्ज की गयी है। सरकारी हथियार लूटे गये हैं। मणिपुर की अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है। जीएसटी संग्रह नहीं हो रहा है। पूरा देश मणिपुर के साथ खड़ा है। प्रधानमंत्री को कम से कम एकबार सदन में आकर यह बताना चाहिए कि वह मणिपुर क्यों नहीं गये।
भारतीय जनता पार्टी के अजीत माधवराव गोपछड़े ने कहा कि सरकार मणिपुर में शांति बहाली कर रही है और अब राज्य में शांति है।
तृणमूल कांग्रेस के देरेक ओब्राईन ने कहा कि प्रधानमंत्री 22 महीने में 3.80 लाख किलोमीटर की यात्रायें की हैं लेकिन 4800 किलोमीटर दूर स्थित मणिपुर नहीं गये हैं। बजट सत्र के दूसरे चरण के पहले दिन क्यों नहीं इस संकल्प को लाया गया।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ए ए रहीम ने कहा कि प्रधानमंत्री मणिपुर नहीं गये। प्रधानमंत्री को मणिपुर जाकर स्थिति का जायजा लेना चाहिए था।
द्रविड मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) की कनिमोझी एनवीएन सोमू ने कहा कि मणिपुर के लोगों को अपने ही राज्य में शरणार्थी बनकर रहना पड़ रहा है। राष्ट्रपति शासन समास्या का समाधान नहीं है। मणिपुर राष्ट्रपति शासन में भी भाजपा के अधीन है।
आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा “ मणिपुर के मुद्दे को लेकर जब मैंने विरोध जताया था तो मुझे सबसे अधिक समय तक सदन से निलंबित रहना पड़ा था। गलती यह था कि मैं सदन के बीचोबीच चला गया था लेकिन 11 महीने तक निलंबित रहा।
राष्ट्रीय जनता दल के संजय यादव ने कहा कि दो साल में मणिपुर में हिंसा का दौर रहा लेकिन डबल इंजन सरकार सोती रही। केन्द्र सरकार ने कभी सूलह की कोशिश नहीं की। डबल इंजन सरकार मूक दर्शक बनकर हिंसा को देखती रही। मणिपुर में कुव्यवस्था जीत गयी और मानवता हार गया।
आईयूएमएल के अब्दुल वहाब ने कहा कि पिछले दो वर्षाें से मणिपुर पर चर्चा की मांग की जा रही थी लेकिन अब जब स्थिति खराब हो गयी तब राष्ट्रपति शासन लगाया गया है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संतोष कुमार पी ने कहा कि मार्च 2026 तक देश से नक्सली समाप्त करने की बात की जा रही है लेकिन मणिपुर के मुद्दे को राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी शामिल नहीं किया गया। प्रधानमंत्री पूरी दुनिया में घुमते हैं लेकिन मणिपुर नहीं जा सकते हैं।
शिवसेना (उधव गुट) की प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि सत्तापक्ष की ओर से कोई भी चर्चा नहीं कर रहे हैं। मणिपुर को लेकर सर्वदलीय बैठक बुलाने की बात होती रही। पूरे 22 महीने मणिपुर जलता रहा है। मणिपुर में यथाशीघ्र एक निर्वाचित सरकार होनी चाहिए।
शेखर
वार्ता

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